Thursday, May 17, 2012
Real face of SRK
Again he is in the news for yet another bad incident, Shah
rukh khan is having the most terrible days of his stardom. One after another story breaks and he is in the news for all the wrong reasons, getting the tag, what he never wanted, of a new face of arrogance and hate.
Shahrukh never ever wanted this brawl to take much glare of media, which took place in wankhede stadium Wednesday night, shahrukh was not even prepared for the fiasco, as he was drunk and bombarding all the shit he could, he forgot that media was there to capture his mostly hidden personality. The real sharukh was in open, slamming security guards and stadium officials as if they were some kind of bad guys from one of his fancy movie. But sorry shahrukh in reality the constitution of India gives equal rights as you possessed from the law.
Whatever shahrukh demonstrated out there in wankhede was typically middle class, as a middle class man would get drunk and will carry his kids to the party and then will for sure get into a brawl and will abuse others with so pure accent, that een in the presence of his own kids.
Anyway it would have been nice if SRK would have abide by the stadium rules and regulations, this would have given his kid something for their future, a father’s tip for being good citizen’s. Instead khan’s kids learned, never to mention, the baddest and ugliest lessons of their life.
Now a case has been registered against SRK after the MCA authorities formally lodged a complaint against him. Mumbai police will now question SRK, although shahrukh spoke out earlier on the day and cleared the air by saying it was the stadium staff which misbehaved with his kids, first and he retaliated only in defense of his kids. But he never regretted for his acts.
Simply saying, shahrukh’s outbreak was just a glimpse of the rich and elite class’s attitude toward day to day rules and regulations which ever citizen have to follow, in india money can change various things and situations, we see every day how a wealthy man gets acquitted by the courts, even if he is charged in the gravest of the cases but the common man gets punished by the same courts for his least of faults. perhaps SRK was in same impression, but he didn’t realize that whatever he did was actually caught by the flashy cameras.
SRK would be depressed and may be feeling low, not because he did shameful act in front of his kids, but was caught on camera perhaps.
Sunday, April 3, 2011
लिखें किस के लिये?

लिखने की अपनी इच्छा पर हर बार कोई ना कोई अतातायी लंगर डाल कर डिगा देता है...। किसी की चाकरी करने पर ऐसा ही होता है। अपने लिए हिन्दुस्तान में वैसे ही सवा अरब बहाने हैं, लेकिन गाहे बगाहे जब बुद्धी लकीर पर आती है तो बाहरी तत्व रेखा मिटा देते हैं। बहरहाल जब लिखने की बारी आती है तो दिमाग़ की सारी नसें यूं सो जाती है मानों प्रधानमंत्री का मोटरी कारवां आ रहा हो और दिल्ली पुलिस ने रास्तों पर ठहरो के नाके लगा दिए हों।
अपन लिखे भी तो क्या, ये सोच कर भी दिल गहरी उदासी के फेरों में चक्कर खाने लगता है। मालूम पड़ता ही नहीं कि कब पर आए और कब फिर गहराइयों में खोते चले गए। गहरी नींद के झौंके और उबासी वैसे ही दिनभर अहमद पटेल के साए की तरह घेरे रहती हैं, जैसे इटली की रानी पर उसका दिखता है। पंजे के तले रहने वाले कई कहते हैं कि साए में कुछ खास बात है तभी तो रानी उसे हटने भी नहीं देती। और अहमदी साया भी कम अय्यारी नहीं करता, सुना है कौन कहां से कब और कैसे चुनावी नय्या पर सवार होगा ये पटेल ही तय करता है। वैसे अपन पैदा नहीं हुए थे तब से राजा-रानी के खेल कहानी में अय्यारों की हैरतअंगेज कहानियां लोगों को हैरान और परेशान करती आई हैं। वैसे लोगों ने देखा भी बहुत कुछ है, ये हिन्दुस्तान है इसलिए लोग सुन कर अनसुना कर देते हैं। वैसे रानी की सास यानि कि महारानी के जमाने में जितने खेल हुए हैं उसकी सूची बनने लग जाए तो हिन्दुस्तान से स्विजरलैंड तक रंगीन कागज़ के गलीचे बिछ जाएं..., मगर अपन को क्या करना है हम भी तो उसी मरी हुई कौम से है।
रानी और महारानी में फर्क बहुत है, महारानी के जमाने में इंटरनेट और केबल टीवी पर आने वाले लीचड़ चैनल कम हुआ करते थे शायद, नहीं तो फर्क फर्क नहीं रहता। रानी के कारनामें इतने महान हैं कि बयां करना कम पड़ जाएगा, असल में जितना इस त्याग की देवी ने लोगों को रुलाया है उतना महारानी भी ना रुला पाईं थीं, हालांकि महारानी ”गराबी हटाओ ” के नारे लगवा कर जरूर गरीबों की तारणहार बन गई थी, लोग तब शायद अफीम का ज्यादा नशा करते थे, इसीलिए महारानी के नारों के आगे की दास्तां भूल गए। आज भी हालत ज्यादा अलग नहीं है, फर्क सिर्फ इतना है कि रानी को मीडिया मैनेजमेंट करना बखूबी आता है। नहीं तो मोहाली में खेले गए वर्ल्ड कप सेमिफाइनल में सचिन के साथ साथ रानी और लाडले का शॉट बार बार नहीं दिखाया जाता...। खैर अपन ज्यादा नहीं बोलेंगे वैसे अपन के कहने या लिखने से ज्यादा फर्क तो पड़ने वाला है नहीं। और लिखे भी किस के लिए... मुर्दा कौम के लिए।
आज़ादी के बाद से आज तक ना जाने बंगाल की खाड़ी में कितना पानी नमकीन हो गया है... ना जाने हिमालय से कितने हिमनद जम कर सूख गए हैं... और ना जाने कितने ही बाघ अपनी खाले उतरवा चुके हैं.... फर्क नहीं पड़ने वाला। कितने ही शेरशाह और ना जाने कितने ही अब्दालियों ने हिंद की आबरू के साथ साथ कफन भी नोंच लिए हैं। लेकिन मजाल क्या है जो हमने अपने हलक से आह निकाली हो...।
ये कौई नहीं जानता कि ये हमारे डीएनए में इंजीनियर्ड है या जींस ही इतने परिशुद्ध है... जो हमें कतार में खड़े हो कर जुल्म सहन करने की ताकत देते हैं...। हर बार हर साल नया औरंगजेब पैदा हो कर हिंदुस्तान में अपनी हुकूमत चलाता है और अपने अनुसार जनता को तंग करने की तरकीबें इजाद करता है। ये जरूरी नहीं की हर इंसान को सिर्फ कोड़ों और तलवारों के दम पर ही प्रताड़ित किया जा सकता है, असल में नए जमाने की खासियत ही ये है कि इन सब के बगैर भी इंसानों को झकझोरा जाता है। जो जिंदा हैं उनके लिए कत्ल होने का डर खौफनाक होता है, वे कत्ल से बचने के लिए आखिरी वक्त तक लड़ते भी रहते हैं... लेकिन जो ये सोच कर बैठा है कि उसे कत्ल होना ही है... वो ना तो हाथ उठाता है और ना ही लड़ने का ही साहस दिखाता है..।
लिख कर दुनिया बदली जा सकती है, लेकिन शायद हिंद के लाडलो को स्वराज का भाव समझाया नहीं जा सकता है। नहीं तो आज़ादी दिलाने वाले बापू के हिसाब से हिंद कब का बन गया होता।
Tuesday, December 28, 2010
अटल मेरे मन से....



अटल बिहारी वाजपेयी जी ने जब 1996 में13 दिन की सरकार बनाई थी, उस वक्त मेरे लिए वो सबसे हर्ष का दिन था। मुझे लोकसभा को वो दृष्य भलि भांति याद है जब विश्वास मत हासिल करने के लिए बहस चल रही थी, और एक एक कर वक्ता अपनी पार्टी के मत को सार्वजनिक कर रहे थे। अंत में जब साफ हो गया था कि अटल जी को सदन का पूरा समर्थन नहीं है और उनकी सरकार नहीं बन सकेगी, मेरा मन दुख से भर उठा और निराशा ने जैसे मुझे पूरी तरह से घेर लिया। मै उस वक्त 9वीं या 10वीं का छात्र था, लेकिन सदन में उस दिन दिया गया अटल जी का वो भाषण मुझे उनका मुरीद बना गया, वो दिन था और आज का दिन है... अटल जैसे मेरे मस्तिष्क में समाहित हो गए हैं... और उनकी हर भाव भंगिमा मेरे स्मृति मन में अमिट छाप छोड़ गई है।
अटल जी को मैने कभी अपने जीवन में साक्षात तो नहीं देखा है... कामना करता हूं कि जल्द मुझे मौका मिलेगा और मै उनसे मिल सकूंगा, लेकिन उन्हें टीवी पर और समाचार चैनलों की रिपोर्ट्स में उनपर चलने वाले पैकेज देखना मै कभी नहीं भूलता था। अटल बिहारी वाजपेयी जी को जितनी बार टीवी पर सुना और देखा, उनके वाक पटुता का मै कायल होता चला गया। मेरे स्मरण में आज तक मैने ऐसा शानदार वक्ता ना तो कभी सुना हो और ना देखा है। अटल जी का कायल सिर्फ मै ही नहीं हूं, अलबत्ता उन्हें सुनने वालों की तादाद करोड़ो में है। आज भी अगर ये बात फैल जाए कि अटल जी बोलने वाले हैं तो मै दावे के साथ कह सकता हूं कि लाखों की भींड़ सैंकंडो में निकल आएगी उन्हें सुनने के लिए। अटल जी का व्यक्तित्व ही ऐसा है कि उनसे लोग स्नेह करने लगते हैं। अटल, अपने राजनीतिक विरोधियों में भी आदरता के पात्र रहे हैं। अटल जी ने वैचारिक रूप से विरोध करने वालों को भी सदा सम्मान दिया, उनकी बातों का मान रखा, शायद यही वजह है कि विपक्षी दल उनकी बातों का मान रखते थे और सम्मान भी करते थे। अटल जी के खिलाफ किसी राजनेता ने कटु वाक्य बोलने की हिमाकत कभी नहीं की, अटल जी के व्यक्तित्व के डर से नहीं बल्कि उनके प्रति सम्मान की वजह से।
आज जब देश में चारों और भ्रष्टाचार और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के साथ साथ नेताओं की बेशर्मी देखने को मिल रही है, तो अटल जी की सक्रीय राजनीति में कमी खल रही है। अटल जी ने भले ही खराब स्वास्थ्य के चलते सक्रीय राजनीति में अपनी दिलचस्पी कम कर दी हो.... लेकिन मै जानता हूं कि उनका देशभक्त हृदय हर पल देश सेवा के लिए तैयार होगा। अटल जी के 86वें जन्म दिन के अवसर पर पूरा देश यही कामना कर रहा है कि वे जल्द स्वास्थ लाभ करें और कलुष से घिर रही राजनीति को निर्मल करने का युद्ध आरंभ करें....।
Sunday, December 12, 2010
देव भूमि में ड्रैगन!
भारत के उत्तरी छोर के दूरदराज के हिमालयी पहाड़ों में है उत्तराखंड। उत्तराखंड जहां अपने अस्तित्व की दसवी सालगिरह मना रहा है। वहीं राज्य के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हो रहा है। उत्तराखंड सामरिक रूप से देश का बेहद महत्वपूर्ण राज्य माना जाता है। चीन और नेपाल की सीमाओं से सटे उत्तराखंड पर लगातार खतरा मंडराता रहता है। फिर चाहे वो विदेशी आक्रांता का भय हो, माओवाद का प्रसार हो... या फिर राज्य के अंदरूनी हालातों के बिगड़ने के आसार ही क्यों ना हो...। उत्तराखंड को लगातार केंद्र सरकार की मदद और निगरानी की आवश्यक्ता है।
राज्य की ज्यादातर जनता ग्रामीण है और पहाड़ी इलाकों में रहती है। लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती और इससे जुड़े छोटे-बड़े व्यवसाय हैं। हालांकि साल 2001 में हुए जनगणना के मुताबिक राज्य में साक्षरता दर 71.62 से ऊपर है, लेकिन दजिस तेजी के साथ राज्यमें साक्षरता का प्रसार हुआ है... उसके मुकाबले यहां रोजगार और अन्य विकल्प नहीं बढ़े हैं। राज्य में आज भी पढ़े-लिखे युवाओँ को दिल्ली-मुम्बई जैसे महानगरों की ओर रुख करना होता है। ऐसे में राज्य में आधूर-भूत सुविधाओँ का ना होना, जनता के बीच आक्रोश को जन्म देता है। ऐसी परिस्थितियों की तलाश में चीन हमेशा से रहा है।
चीन की विदेश नीति ही विस्तार की नीति पर आधारित है। 1950 में चीन का तिब्बत पर कब्जा हुआ... जिसके बाद उसकी नजर भारत के सीनावर्ची राज्यों पर टिकी। चीन ने नेपाल में गुप्त रूप से माओवाद को बढ़ावा दिया... जिसके फल स्वरूप विश्व के एक मात्र हिन्दु राष्ट्र में माओवादी सत्ता के नज़दीक पहुंच गए। चीन के हौंसले इतने बुलंद हैं कि अब वो भारत के कई राज्यों पर अपनी नजर गढ़ाए बैठा है। चीन अरुणाचल को अपना अंग बता ही रा है...। इसके साथ साथ वो वहां के युवाओं को बर्गलाना चाह रहाव है। चीन ने इसके लिए भारत से सटी सीमाओँ पर सड़कों का एक व्यापक जाल बिछा दिया है। यही नहीं इन सड़कों के आसपास तमाम शैक्षणिक संस्थाओं को भी विकसित किया है जिनके मार्फत वो अरुणाचल जैसे राज्यों के युवाओं को अपनी ओर खींचने की कुचाल भी चलने लगा है।
ऐसे ही हालात उत्तराखंड में भी पैदा हो सकते हैं। सितंबर 2009 में चीनी सैनिक उत्तराखंड के चमोली जिले के रिमखिम तक पहुंच गए थे... वे वहां अपने पीछे बिस्कुट के रैपर और अन्य सामग्रियां छोड़ गए थे, जो बताने के लिए काफी है कि चीनी सैनिकों की क्या मंशा रही होगी। हालात ये हैं कि चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबर भारतीयों सुरक्षा एजेंसियों को तब लगी जब वे वापस अपने ठिकानों के लिए लौट चुके थे। लिहाजा उत्तराखंड और इसके जैसे सीमावर्ती राज्यों के प्रति केंद्र सरकार को रुख उदार होना चाहिए। केंद्र सरकार को चाहिए को वो राज्यों को विशेष आर्थिक पैकेज दे, ताकि राज्य आधार भूत सुविधाओं और बुनियादी संरचनाऔं से महरूम ना रह सके। और चीन जैसे राष्ट्रों की मंशा पर लगाम कसी जा सके।
राज्य की ज्यादातर जनता ग्रामीण है और पहाड़ी इलाकों में रहती है। लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती और इससे जुड़े छोटे-बड़े व्यवसाय हैं। हालांकि साल 2001 में हुए जनगणना के मुताबिक राज्य में साक्षरता दर 71.62 से ऊपर है, लेकिन दजिस तेजी के साथ राज्यमें साक्षरता का प्रसार हुआ है... उसके मुकाबले यहां रोजगार और अन्य विकल्प नहीं बढ़े हैं। राज्य में आज भी पढ़े-लिखे युवाओँ को दिल्ली-मुम्बई जैसे महानगरों की ओर रुख करना होता है। ऐसे में राज्य में आधूर-भूत सुविधाओँ का ना होना, जनता के बीच आक्रोश को जन्म देता है। ऐसी परिस्थितियों की तलाश में चीन हमेशा से रहा है।
चीन की विदेश नीति ही विस्तार की नीति पर आधारित है। 1950 में चीन का तिब्बत पर कब्जा हुआ... जिसके बाद उसकी नजर भारत के सीनावर्ची राज्यों पर टिकी। चीन ने नेपाल में गुप्त रूप से माओवाद को बढ़ावा दिया... जिसके फल स्वरूप विश्व के एक मात्र हिन्दु राष्ट्र में माओवादी सत्ता के नज़दीक पहुंच गए। चीन के हौंसले इतने बुलंद हैं कि अब वो भारत के कई राज्यों पर अपनी नजर गढ़ाए बैठा है। चीन अरुणाचल को अपना अंग बता ही रा है...। इसके साथ साथ वो वहां के युवाओं को बर्गलाना चाह रहाव है। चीन ने इसके लिए भारत से सटी सीमाओँ पर सड़कों का एक व्यापक जाल बिछा दिया है। यही नहीं इन सड़कों के आसपास तमाम शैक्षणिक संस्थाओं को भी विकसित किया है जिनके मार्फत वो अरुणाचल जैसे राज्यों के युवाओं को अपनी ओर खींचने की कुचाल भी चलने लगा है।
ऐसे ही हालात उत्तराखंड में भी पैदा हो सकते हैं। सितंबर 2009 में चीनी सैनिक उत्तराखंड के चमोली जिले के रिमखिम तक पहुंच गए थे... वे वहां अपने पीछे बिस्कुट के रैपर और अन्य सामग्रियां छोड़ गए थे, जो बताने के लिए काफी है कि चीनी सैनिकों की क्या मंशा रही होगी। हालात ये हैं कि चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबर भारतीयों सुरक्षा एजेंसियों को तब लगी जब वे वापस अपने ठिकानों के लिए लौट चुके थे। लिहाजा उत्तराखंड और इसके जैसे सीमावर्ती राज्यों के प्रति केंद्र सरकार को रुख उदार होना चाहिए। केंद्र सरकार को चाहिए को वो राज्यों को विशेष आर्थिक पैकेज दे, ताकि राज्य आधार भूत सुविधाओं और बुनियादी संरचनाऔं से महरूम ना रह सके। और चीन जैसे राष्ट्रों की मंशा पर लगाम कसी जा सके।
टू-जी, संसद और बवाल
भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब संसद की कार्रवाई लगातार तीन हफ्तों तक बाधित रही...। और बावजूद इसके सरकार अपने कर्तव्यों के पालन में हीलाहवाली बरती जा रही है। सत्ताधारी गठबंधन यूपीए पर चारों ओर से भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं, लेकिन सरकार इन आरोपों को गंभीरता से ना लेते हुए लगातार विपक्ष की उपेक्षा कर रही है। विपक्ष सरकार से टू-जी स्पैक्ट्रम घोटाले का सच जानना चाहती है, लेकिन सरकार आरोपी मंत्री को हटा कर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है। क्या जांच का दिखावा कर सरकार अपनी जवाबदेही से बच सकती है।
दरअसल, जिस अंदाज में रोजाना टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़े तथ्य और जानकारियों आ रही है... उससे पता चलता है कि मामले में सरकारी तंत्र भी संलिप्त है। यही नहीं टू-जी घोटाले में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की भूमिका भी संदेह के दायरे में है। ऐसे में देश की जनता पसोपेश में है। जनता जानना चाहती है कि आखिर अरबों खरबों के इस महा घोटाले का सच क्या है। क्यों सरकार विपक्ष की संयुक्त संसदीय समिति यानि जेपीसी की मांग को ठुकरा रही है।
देखा जाए तो विपक्ष जिस जेपीसी की मांग पर अड़ा हुआ है, वो मौजूदा हालातों के मद्देनज़र बेहद जरूरी साबित हो सकती है। टू-जी स्पैकेट्रम घोटाला, कॉमनवेल्त खेल घोटाला या फिर आदर्श हाउसिंग का घपला ही क्यों ना हो...। सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से इन से जुड़े सबूतों और साक्ष्यों को मिटाने का जो खेल जारी है, उसे देखते हुए विपक्ष की मांग को नाजायज नहीं ठहराया जा सकता है। हालांकि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के अतर्गत टू-जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जांच कराने की मंजूरी पेश कर दी है। लेकिन क्या सरकार सीबीआई के दुरुपयोग ना होने की गारंटी विपक्ष को दे सकती है, नहीं।
ये वाकई सोचने वाली बात है कि जिस सीबीआई के हवाले सरकार ने तमाम घोटालों की परत खंगालने का जिम्मा दिया है... वो खुद आज अपनी निष्पक्षता खो चुकी है। इससे भी बड़ा विवाद तो देश के मुख्य सतर्क्ता आयुक्त को लेकर है। सीवीसी थॉमस जो खुद केरल के पॉम ऑयल मामले में अभियुक्त है और जो स्पैकेट्रम के आवंटन को सही ठहरा चुके हैं, वो कैसे देश में किसी घोटाले की निष्पक्ष जांच को सुनिश्चित कर सकते हैं। ऐसे में जितने दिनों तक सत्ताधारी यूपीए गठबंधन विपक्ष की मांग को टालता रहेगा.... उसकी साख पर बट्टा भी उसी रफ्तार के साथ लगता रहेगा।
दरअसल, जिस अंदाज में रोजाना टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़े तथ्य और जानकारियों आ रही है... उससे पता चलता है कि मामले में सरकारी तंत्र भी संलिप्त है। यही नहीं टू-जी घोटाले में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की भूमिका भी संदेह के दायरे में है। ऐसे में देश की जनता पसोपेश में है। जनता जानना चाहती है कि आखिर अरबों खरबों के इस महा घोटाले का सच क्या है। क्यों सरकार विपक्ष की संयुक्त संसदीय समिति यानि जेपीसी की मांग को ठुकरा रही है।
देखा जाए तो विपक्ष जिस जेपीसी की मांग पर अड़ा हुआ है, वो मौजूदा हालातों के मद्देनज़र बेहद जरूरी साबित हो सकती है। टू-जी स्पैकेट्रम घोटाला, कॉमनवेल्त खेल घोटाला या फिर आदर्श हाउसिंग का घपला ही क्यों ना हो...। सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से इन से जुड़े सबूतों और साक्ष्यों को मिटाने का जो खेल जारी है, उसे देखते हुए विपक्ष की मांग को नाजायज नहीं ठहराया जा सकता है। हालांकि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के अतर्गत टू-जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जांच कराने की मंजूरी पेश कर दी है। लेकिन क्या सरकार सीबीआई के दुरुपयोग ना होने की गारंटी विपक्ष को दे सकती है, नहीं।
ये वाकई सोचने वाली बात है कि जिस सीबीआई के हवाले सरकार ने तमाम घोटालों की परत खंगालने का जिम्मा दिया है... वो खुद आज अपनी निष्पक्षता खो चुकी है। इससे भी बड़ा विवाद तो देश के मुख्य सतर्क्ता आयुक्त को लेकर है। सीवीसी थॉमस जो खुद केरल के पॉम ऑयल मामले में अभियुक्त है और जो स्पैकेट्रम के आवंटन को सही ठहरा चुके हैं, वो कैसे देश में किसी घोटाले की निष्पक्ष जांच को सुनिश्चित कर सकते हैं। ऐसे में जितने दिनों तक सत्ताधारी यूपीए गठबंधन विपक्ष की मांग को टालता रहेगा.... उसकी साख पर बट्टा भी उसी रफ्तार के साथ लगता रहेगा।
Friday, November 6, 2009
बाहरी की राजनीति!



राजनेताओँ के लिए मुद्दों की कमी हो गई है.... या फिर उनकी सोच सीमित हो गई है... उन्हें अपने देश राज्य या फिर जिले के विकास में बाहरी लोग रोड़े अटकाते नज़र आते हैं....। तभी तो वक्त बे वक्त कोई ना कोई राजनेता अपनी खामियों को छिपाने के लिए सारी अव्यवस्था या फिर भूख, गरीबी, जहालत और ना जाने किन किन दुर्गतियों और कमियों के लिए बाहरी लोगों को जिम्मेदार ठहरा देते हैं.... लेकिन क्या नेता कभी सच का सामना करना पसंद करेंगे....। क्या वे इमानदारी से अपनी खामियों को मानेंगे.... शायद नहीं... यही तो लोकतंत्र और राजनीति का कड़वा सच है। कोई नेता सार्वजनिक तौर पर कभी खुद को असफल नहीं मानता ना ही वो अपने काम को कम आंक कर बखारता है। राजनीति के इसी खेल में असली मुद्दे दब कर रह जाते हैं.... और बाहरी का मुद्दा बन कर उभर आता है। देश की राजधानी दिल्ली की मुख्यमंत्री को जब अपने राज्य में जमी मुसीबतों का हल नहीं सूझता है, तो वो तपाक से बाहरी लोगों पर उन समस्याओँ का ठिकरा फोड़ देती हैं...। यही नहीं जब राज ठाकरे को उसके चाचा वारिस नहीं बनाते हैं तो वो पर प्रांतीयों के खिलाफ दंगे करने पर उतर आता है....। दूसरे प्रांत से आए लोगों के खिलाफ जहर उगल कर ये नेता अपनी खुद की कमियों को छिपा कर निजी स्वार्थों को परवान चढ़ाते हैं...। ताज़ा मामला मध्य प्रदेश का देखें तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी वही किया जो एक नेता से अपेक्षित है...। उन्होंने अपने राज्य में फैली बेरोज़गारी के लिए अपने प्रशासन और अपनी सरकार की नितियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया है....। ना ही उन्होंने बेराजगारी की समस्या के निवारण के लिए ही विस्तृत योजना को जनता के सामने रखा.... बल्कि उन्होने राज्य में पसरी बेरोजगारी के लिए ही बाहरी लोगों को ही जिम्मेदार ठहरा दिया....। अब आप चाहे कितना भी इनकार करें शिवराज जी....या बात से पलटने का काम करें...। लेकिन जो बात सामने आ चुकी है वो देखा जा सकती है। लिहाज़ा अच्छा ये होता कि आप अपनी जिम्मेदारी को समझते.... जनता के सामने अपनी गलतियों को मानते।
Friday, October 23, 2009
किसकी जीत और किसकी हार

तीन राज्यों के चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया कि आज के लोकतंत्र में जनता क्या चाहती है वो ज्यादा मायने नहीं रखता... अलबत्ता राजनेता क्या चाहते हैं, इस बात का जोर ज्यादा रहता है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अरुणाचल के चुनावों को जरा गौर से देखा जाए तो सारी हकीकत सामने आ जाती है। तीनों राज्यों में टिकट बंटवारे से कहानी शुरु होती है... तीनों प्रदेशों में सभी राजनीतिक दलों ने इस बात की तसल्ली करनी चाही कि उनके सगे संबंधियों और रिश्तेदारों को टिकट पहले मिले... बाद में किसी और के बरे में सोचा गया.... इनमें भी वे ही लोग थे जो या तो पूंजीपति थे या फिर सत्ता के गलियारों में घूमने वाले दलाल.... आम आदमी के नेता की तो बारी ही नहीं आई।
आम आदमी की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों ने आम आदमी को सत्ता के पर्व से इतना दूर कर दिया है कि वो तो वोट डालने जाता ही नहीं है। ज्यदातर लोग इस दौरान शहरों से दूर छुट्टियां मनाने चले जाते हैं... असल में वो अपनी खीज और कुछ ना कर पाने की झल्लाहट से दूर भाग रहे हैं...। क्योंकि आज देश में राजनेताओँ और उनकी पार्टियों ने ऐसे तंत्र को विकसित कर लिया है... जिसमें केवल फायदा उनका ही होता है और नुक्सान केवल जनता भोगती है। देश में मौजूदा स्थिति को देखा जाए तो महंगाई इतना बड़ा मुद्दा है कि हर आम और खास को इससे फर्क पड़ा है। लेकिन चुनाव नतीज़ों से पता चलता है कि बदलाव तो आया नहीं लेकिन जो कुशासन के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे.... उनका भी मनोबल टूट गया है। क्योंकि सत्ताधारियों ने अपने रसूख का पूरा फायदा उठाया है। पूरे तंत्र में एक ही तरह के लोग बैठे हैं... जिनका एक ही मकसद है... जो हो रहा है, उसे होने देना... मतलब कि सब खाओ, मिल कर खाओ... बस खाओ। कौन नही जानता कि हरियाणा, महाराष्ट्र में ज्यादातर प्रत्याशी किसी ना किसी तौर पर रियल एस्टेट और बिल्डर लॉबी से जुड़े हुए हैं। और सभी जानते हैं कि जमीन अदिग्रहण में कैसे धांधलियां हो रही हैं....। असल में इसका पता कभी चलता ही नहीं कि कैसे राजनीतिक दल और माफिया मिलकर देश को बेच रहे हैं वो भी देश के कानून के तहत ही। अगर चण्डीगढ़ में जमीन मामला सामने नहीं आता... पंजाब के राज्यपाल पर अंगुली उठी तो उसने केंद्र के मंत्रियों के नाम भी बक दिए...। अब सोचिए कि ऐसा क्या हुआ.... हुआ कुछ नहीं बस पंजाब में सत्ता परिवर्तन हुआ और सारा मामला साफ हो गया।
राजनीति और भ्रष्टाचार हमेशा से एक दूसरे के पूरक रहे हैं.... कसकर हमारे देश में...। तमाम घोटालों में राजनेताओं की केंद्रीय भूमिका रही है। चाहे बोफोर्स दलाली मामला हो, हवाला काण्ड हो, चारा घोटला हो, या फिर इस दौर में चल रहे जमीन अधिग्रहण के मामले। जाहिर तौर पर इन मामलों में गंभीरता से जांच होनी चाहिए और पता लगाना चाहिए कि क्या सत्ताधरी जानबूझ कर कानूनों में फेरबदल करके अपने अनुसार ढाल रहे हैं।
ये किसी से नहीं छिपा है कि राजनीति का स्तर गिरा है। और विपक्ष क्यों परवर्तन नहीं कर पा रहा है इसकी वजह है वही निजी स्वार्थ जिसके बलबूते सत्ताधारी पक्ष मलाई का रहा है। विपक्ष भी उसी सिस्टम का हिस्सा बना हुआ है जिसके बलबूते सत्ता चल रही है.... लिहाज़ा विपक्ष आम आदमी के मुद्दों को नहीं उठा पाया है। देश में कासतौर पर विपक्षी दलों को अपनी सोच में बदलाव करना होगा। उन्हें समझना होगा कि कोई बड़ा बदलाव किसी बड़ी क्रांति के साथ ही आता है। लिहाज़ा जमीन पर उतर कर आम और गरीब लोगों के हकों की लड़ाई करने पर ही विपक्ष परिवर्तन लाने की स्थिति में पहुंच सकता है।
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